
मौनी अमावस्या का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है माघ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहते हैं। इस दिन को लेकर ऐसी धारणा है कि इस दिन मौन रहना चाहिए “मौनी” शब्द की उत्पत्ति “मुनि” शब्द से हुई है। मौनी अमावस्या को लेकर ऐसी मान्यता है कि इस दिन मौन धारण कर व्रत करना चाहिए और यमुना और गंगा में स्नान करना चाहिए यदि यह अमावस्या सोमवार के दिन होती है तो इसका महत्व और अधिक हो जाता है सोमवार को पढ़ने वाली अमावस्या “सोमवती अमावस्या” भी कहलाती है वैसे माघ मास में पढ़ने वाली अमावस्या और पूर्णिमा दोनों की तिथियां पर्व के रूप में मानी जाती हैं इन दिनों में पृथ्वी के किसी ना किसी भाग पर सूर्य या चंद्रमा ग्रहण हो सकता है। अमावस्या और पूर्णिमा को लेकर ऐसी मान्यता है कि इस दिन पुण्य कर्म करने से आपके इस देवी देवता प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा आप पर सदैव बनी रहती है।

मौनी अमावस्या कथा
कथा के अनुसार कांची पुरी में देव स्वामी नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम धनवती था उसके सात पुत्र थे व एक पुत्री थी जिसका नाम गुणवती था। ब्राह्मण ने अपने सातों पुत्रों का विवाह करने के पश्चात अपनी बेटी के लिए वर खोजने के लिए अपने जेष्ठ पुत्र को भेजा उसी दौरान किसी पंडित ने ब्राह्मण की पुत्री की जन्मकुंडली देखी और बताया की सप्तपदी होते ही गुणवती विधवा हो जाएगी तब उस ब्राह्मण ने पूछा की गुणवती के इस दोष का निवारण कैसे होगा। कृपया बताएं तब पंडित ने बताया की सोमा का पूजन करने से दोष दूर होगा फिर सोमा का परिचय देते हुए पंडित जी ने बताया कि वह एक धोबिन है वह सिंहल दीप पर निवास करती है उसे प्रसन्न करो और गुणवती के विवाह से पहले यहां बुला लो तब देव स्वामी का छोटा बेटा बहन को साथ लेकर सिंहल दीप की ओर प्रस्थान किया। परंतु सागर तट के समीप जाने पर नौका न मिलने पर सागर पार करने की चिंता में वृक्ष के नीचे बैठ गए। वहां एक घोसले में गिद्ध का परिवार रहता था। उस घोसले में सिर्फ गिद्ध के बच्चे थे। गिद्ध के बच्चे सब देख रहे थे। सांय काल बच्चों ने अपनी मां को उनकी सारी व्यथा बताई और कहा कि जब तक वे दोनों कुछ नहीं खाएंगे तब तक हम भी कुछ नहीं खाएंगे तब ममता में वशीभूत गिद्ध माता उनके पास आई और बोली कि मैंने आपकी सभी इच्छाओं को जान लिया है। अतः मैं इस वन से फल व कंदमूल लेकर आती हूं आप भोजन कर लीजिए। मैं प्रातः काल आपको सागर पार कर सिंहल दीप की सीमा तक पहुंचा दूंगी इस प्रकार गिद्ध माता की सहायता से वह दोनों सिंहल दीप जा पहुंचे। वे दोनों प्रातः उठकर सोमा के घर की सफाई लिपाई कर देते थे।
सोमा ने अपनी बहू से पूछा प्रातः घर को कौन लीपता है सब ने कहा हमारे सिवा यह काम कौन करेगा। किंतु सोमा को अपनी बहुओं की बातों पर विश्वास नहीं हुआ अतः सोमा ने रहस्य को जाना तथा बहन भाई से इस संबंधी सारी बात पूछी तब सोमा के भाई ने बहन संबंधी सभी बातें बता दी। सोमा ने उनकी सेवा से प्रभावित होकर उनके साथ चलने का आश्वासन दिया। तथा सोमा ने अपनी बहुओं से कहा कि मेरी अनुपस्थिति में यदि किसी का देहांत हो जाए तो उसके शरीर को नष्ट मत करना तथा मेरा इंतजार करना। फिर सोमा ने कांची पुरी के लिए प्रस्थान किया दूसरे दिन गुणवती के विवाह का कार्यक्रम हुआ। सप्तपदी होते ही उसका पति मर गया सोमा ने तुरंत अपने पुण्य का फल गुणवती को प्रदान कर दिया और तुरंत ही उसका पति जीवित हो गया सोमा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और अपने घर चली गई। उधर गुणवती को पुण्य फल देने से सोमा के पुत्र जमाता तथा पति की मृत्यु हो गई सोमा ने पुण्य फल संचित करने के लिए मार्ग में पीपल के वृक्ष की छाया में विष्णु जी का पूजन करके 108 परिक्रमा की जिसके पूर्ण होने पर उसके परिवार में मृतक जन जीवित हो उठे।
इस प्रकार निष्काम भाव से किया गया कार्य सदैव फल दाई होता है और यही पुण्य Mauni Amavasya मौनी अमावस्या प्रतीक है।
